Question:-01
संप्रेषण की प्रक्रिया को समझाइए ।
Answer:
संप्रेषण की प्रक्रिया
संप्रेषण एक गतिशील और बहुआयामी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से दो या अधिक व्यक्ति विचारों, भावनाओं, सूचनाओं और अर्थों का आदान-प्रदान करते हैं। यह मानवीय संबंधों की नींव है और सामाजिक अंत:क्रिया का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। संप्रेषण की प्रक्रिया को समझने के लिए इसके घटकों और चरणों का विश्लेषण आवश्यक है।
संप्रेषण के मुख्य घटक
संप्रेषण प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण घटक शामिल होते हैं जो इसके प्रवाह को निर्धारित करते हैं।
प्रेषक (Sender): वह व्यक्ति या समूह जो संदेश को प्रारंभ करता है। प्रेषक के पास संप्रेषित करने के लिए एक विचार, भावना या सूचना होती है। उदाहरण के लिए, एक शिक्षक जो कक्षा में एक अवधारणा को समझाना चाहता है।
संदेश (Message): वह सामग्री या विचार जिसे संप्रेषित किया जाना है। यह विचार, भावना, तथ्य या कोई राय हो सकती है।
माध्यम (Channel): वह रास्ता या साधन जिसके द्वारा संदेश भेजा जाता है। माध्यम मौखिक (भाषण, बातचीत), अमौखिक (हाव-भाव, चेहरे के भाव), या लिखित (पत्र, ईमेल, रिपोर्ट) हो सकता है।
प्राप्तकर्ता (Receiver): वह व्यक्ति या समूह जिसके लिए संदेश intended है। प्राप्तकर्ता संदेश को ग्रहण करता है और उसका अर्थ निकालने का प्रयास करता है।
प्रतिपुष्टि (Feedback): प्राप्तकर्ता द्वारा प्रेषक को दिया गया response। यह संप्रेषण प्रक्रिया को चक्रीय बना देता है और यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि संदेश सही ढंग से समझा गया है या नहीं। उदाहरण के लिए, एक छात्र द्वारा शिक्षक के प्रश्न का उत्तर देना।
विकृतियाँ (Noise): यह कोई भी बाधा है जो संदेश के सटीक transmission या reception में रुकावट डालती है। यह भौतिक (शोर, दूरी), मनोवैज्ञानिक (पूर्वाग्रह), या भाषाई (जटिल शब्दजाल) हो सकती है।
संप्रेषण प्रक्रिया के चरण
संप्रेषण एक सरल रैखिक क्रिया न होकर एक जटिल प्रक्रिया है, जिसके निम्नलिखित चरण हैं:
विचार का निर्माण (Ideation): सबसे पहले, प्रेषक के मन में संप्रेषित करने योग्य एक विचार उत्पन्न होता है।
संकेतन (Encoding): प्रेषक अपने विचार या भावना को शब्दों, प्रतीकों, हाव-भाव या संकेतों में बदलता है ताकि उसे भेजा जा सके। यह प्रक्रिया प्रेषक के अनुभव, संस्कृति और संदर्भ पर निर्भर करती है।
प्रसारण (Transmission): संकेतित संदेश को चुने हुए माध्यम (जैसे बोलकर, लिखकर, या इशारे करके) के through प्राप्तकर्ता तक पहुँचाया जाता है।
अर्थ निरूपण (Decoding): प्राप्तकर्ता प्राप्त संकेतों को समझकर उनका अपने स्वयं के अनुभव और पृष्ठभूमि के आधार पर अर्थ निकालता है। यही वह बिंदु है जहाँ संदेश वास्तव में समझा जाता है।
प्रतिपुष्टि (Feedback): अंत में, प्राप्तकर्ता प्रतिक्रिया देता है, जो दर्शाती है कि उसने संदेश को किस प्रकार ग्रहण किया है। यह प्रतिक्रिया एक नए संप्रेषण चक्र की शुरुआत कर सकती है।
संक्षेप में, संप्रेषण एक सतत और अंतःक्रियात्मक प्रक्रिया है जिसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रेषक द्वारा भेजे गए संदेश और प्राप्तकर्ता द्वारा ग्रहण किए गए अर्थ के बीच कितनी समानता है। प्रभावी संप्रेषण के लिए स्पष्टता, सही माध्यम का चयन और प्रतिपुष्टि पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है।
Question:-02
जनसंचार माध्यमों की भाषा पर प्रकाश डालिए।
Answer:
जनसंचार माध्यमों की भाषा
जनसंचार माध्यम आधुनिक समाज की नब्ज़ हैं, जो सूचना, विचार और मनोरंजन के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं। इन माध्यमों—जैसे समाचार पत्र, टेलीविजन, रेडियो और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म—की भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि एक शक्तिशाली सामाजिक-सांस्कृतिक उपकरण है जो जनमत को आकार देती है और वास्तविकता के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जनसंचार की भाषा की प्रकृति को उसकी विशेषताओं, कार्यों और चुनौतियों के संदर्भ में समझा जा सकता है।
भाषाई विशेषताएँ: स्पष्टता से लेकर संक्षिप्तता तक
जनसंचार माध्यमों की भाषा की कुछ प्रमुख विशेषताएँ इसे साहित्यिक या औपचारिक भाषा से अलग करती हैं। सबसे पहली विशेषता है सरलता और स्पष्टता। चूंकि इन माध्यमों का लक्ष्य दर्शकों का एक विविध और व्यापक समूह होता है, इसलिए भाषा को सरल, सहज और आम बोलचाल के करीब रखा जाता है। जटिल विचारों को भी सरल शब्दों और छोटे-छोटे वाक्यों में प्रस्तुत किया जाता है ताकि हर स्तर के श्रोता या पाठक उसे आसानी से समझ सकें।
दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता है संक्षिप्तता। विशेष रूप से टेलीविजन और ऑनलाइन खबरों में समय और स्थान की सीमा के कारण भाषा को अत्यंत संक्षिप्त और मितव्ययी बनाना पड़ता है। हेडलाइन्स या 'टिकर' इसके सटीक उदाहरण हैं, जहाँ पूरी खबर को कुछ शब्दों में समेट दिया जाता है, जैसे "केंद्र सरकार ने की नई शिक्षा नीति की घोषणा"।
तीसरी विशेषता है आकर्षक और चित्रात्मक भाषा का प्रयोग। दर्शकों का ध्यान खींचने और संदेश को यादगार बनाने के लिए मीडिया जानबूझकर ऐसे शब्दों और मुहावरों का इस्तेमाल करता है जो तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करें। उदाहरण के लिए, 'तबाही', 'कहर', 'महाघोटाला' जैसे शब्दों का प्रयोग सामान्य खबरों को भी नाटकीय बना देता है। इसके अलावा, मिश्रित शैली का चलन भी बढ़ा है, जहाँ हिंदी में अंग्रेजी के शब्द (जैसे 'लोकसभा इलेक्शन', 'सुपरहिट फिल्म') सहज रूप से शामिल हो जाते हैं।
भाषा के कार्य: सूचना देना, शिक्षित करना और प्रभावित करना
जनसंचार माध्यमों की भाषा केवल सूचना देने तक सीमित नहीं है; इसके कई गहन कार्य हैं। इसका प्राथमिक कार्य सूचनात्मक है—समाज को दुनिया में हो रही घटनाओं से अवगत कराना। हालाँकि, यह सूचना किस रूप में और किस कोण से दी जा रही है, यह एक विचारधारात्मक कार्य को भी दर्शाता है। मीडिया की भाषा अक्सर एक特定 दृष्टिकोण या नैरेटिव को बढ़ावा देती है, चाहे वह राजनीतिक हो, सामाजिक हो या आर्थिक। उदाहरण के लिए, किसी प्रदर्शन को 'आंदोलन' कहना या 'उपद्रव' कहना, भाषा के माध्यम से पाठक की धारणा को प्रभावित करता है।
इसके साथ ही, मीडिया की भाषा का एक महत्वपूर्ण शैक्षिक और सामाजिक कार्य भी है। यह जनता को न केवल खबरें देती है बल्कि उन्हें विभिन्न मुद्दों पर शिक्षित भी करती है, चाहे वह स्वास्थ्य हो, पर्यावरण हो या कानून। इस प्रकार, यह सार्वजनिक चर्चा को आकार देकर सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करती है।
चुनौतियाँ और जिम्मेदारी: संतुलन की आवश्यकता
जनसंचार माध्यमों की भाषा के सामने कई चुनौतियाँ हैं, जिनमें सबसे बड़ी है निष्पक्षता और तटस्थता बनाए रखना। भाषा के चयन के through पूर्वाग्रह (bias) का प्रवेश आसानी से हो जाता है। किसी राजनेता के भाषण को 'जोशीला' बताना या 'आक्रामक' बताना, रिपोर्टर की अपनी धारणा को दर्शाता है। इसके अलावा, अतिसरलीकरण की प्रवृत्ति भी एक खतरा है। जटिल अंतरराष्ट्रीय मुद्दों या आर्थिक नीतियों को कुछ सेकंड की क्लिप या संक्षिप्त लेख में समेटने से उनका वास्तविक संदर्भ और बारीकियाँ खत्म हो जाती हैं।
इन चुनौतियों के मद्देनजर, मीडिया की भाषा में जिम्मेदारी का होना अत्यंत आवश्यक है। यह सुनिश्चित करना कि भाषा सटीक, संतुलित और भड़काऊ न हो, मीडिया की साख और समाज में उसकी भूमिका के लिए महत्वपूर्ण है। भाषा का दुरुपयोग फेक न्यूज, घृणा और सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दे सकता है।
निष्कर्षतः, जनसंचार माध्यमों की भाषा एक गतिशील और शक्तिशाली घटना है। यह न केवल हमें बताती है कि क्या सोचना है, बल्कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह हमें बताती है कि कैसे सोचना है। इसलिए, इसकी विशेषताओं और प्रभावों के प्रति जागरूक होना न केवल मीडिया व्यवसायियों बल्कि हर जिम्मेदार नागरिक के लिए आवश्यक है।
Question:-03
आंगिक संप्रेषण और भाषा को रेखांकित कीजिए।
Answer:
आंगिक संप्रेषण और भाषा
मानवीय संप्रेषण एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें आंगिक संप्रेषण (अशाब्दिक संप्रेषण) और भाषा (शाब्दिक संप्रेषण) दो प्रमुख आधार हैं। ये दोनों ही हमारे दैनिक जीवन में विचारों, भावनाओं और सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनके बीच के अंतर और समन्वय को समझना अंतरवैयक्तिक संबंधों की गहरी समझ प्रदान करता है।
आंगिक संप्रेषण: शरीर की भाषा
आंगिक संप्रेषण से तात्पर्य उन सभी संकेतों से है जो बिना शब्दों के भेजे और प्राप्त किए जाते हैं। इसमें शारीरिक गतिविधियाँ, भाव-भंगिमाएँ, स्वर का उतार-चढ़ाव, और यहाँ तक कि व्यक्तिगत दूरी भी शामिल होती है। उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति बात करते समय सीधी आँखें नहीं मिलाता, तो यह असहजता या असत्य का संकेत हो सकता है। इसी प्रकार, मुस्कुराहट स्वागत और सकारात्मकता दर्शाती है, जबकि भौहें चढ़ाना आश्चर्य या क्रोध व्यक्त कर सकता हैं।
आंगिक संप्रेषण की एक विशेषता यह है कि यह अक्सर अनैच्छिक होता है और वास्तविक भावनाओं को प्रकट करने में अधिक विश्वसनीय माना जाता है। यह शाब्दिक संदेश को मजबूत, कमजोर या उसके विपरीत भी कर सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति "मैं ठीक हूँ" कहते हुए उदास चेहरा बनाए रखता है, तो उसका अशाब्दिक संकेत शाब्दिक संदेश को अविश्वसनीय बना देता है।
भाषा: विचारों का माध्यम
भाषा, दूसरी ओर, संप्रेषण का एक संरचित और प्रतीकात्मक माध्यम है। यह ध्वनियों, शब्दों और व्याकरण के नियमों का उपयोग करके जटिल विचारों, अमूर्त अवधारणाओं और विस्तृत जानकारी को सटीक रूप से व्यक्त करने में सक्षम बनाती है। भाषा का उपयोग हम न केवल वर्तमान की बातचीत के लिए करते हैं, बल्कि अतीत के अनुभवों को संजोने और भविष्य की योजनाएँ बनाने के लिए भी करते हैं।
भाषा की शक्ति इसकी स्पष्टता और सूक्ष्मता में निहित है। उदाहरण के लिए, कानून, विज्ञान और साहित्य जैसे क्षेत्र पूरी तरह से भाषा की सटीकता और बारीकियों पर निर्भर हैं। हालाँकि, भाषा की अपनी सीमाएँ भी हो सकती हैं, जैसे कि सांस्कृतिक अवरोध या शब्दों के सीमित अर्थ, जो कई बार गलतफहमियाँ पैदा कर सकते हैं।
दोनों का समन्वय: संपूर्ण संप्रेषण
वास्तविक जीवन में, आंगिक संप्रेषण और भाषा एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते हैं। प्रभावी संप्रेषण के लिए दोनों का सामंजस्यपूर्ण होना आवश्यक है। एक अच्छा वक्ता न केवल अपने शब्दों का चयन सावधानी से करता है, बल्कि अपने हाव-भाव, आवाज़ के लहजे और शारीरिक मुद्रा का उपयोग करके अपने संदेश को और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
निष्कर्षतः, आंगिक संप्रेषण और भाषा मानव संवाद के दो पहलू हैं जो एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। आंगिक संप्रेषण भावनाओं और दृष्टिकोण की गहरी परत प्रदान करता है, जबकि भाषा सटीकता और विस्तार की अनुमति देती है। दोनों के बीच संतुलन ही सफल और प्रामाणिक संप्रेषण की कुंजी है।
Question:-04
साक्षात्कार के विभिन्न रूपों को स्पष्ट कीजिए।
Answer:
साक्षात्कार के विभिन्न रूप
साक्षात्कार (Interview) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसका उपयोग जानकारी प्राप्त करने, उम्मीदवारों का मूल्यांकन करने या किसी विशेष उद्देश्य हेतु विचार-विनिमय के लिए किया जाता है। विभिन्न परिस्थितियों और उद्देश्यों के आधार पर साक्षात्कार के अनेक रूप विकसित हुए हैं। प्रत्येक रूप का अपना विशिष्ट उद्देश्य और प्रक्रिया होती है। नीचे प्रमुख साक्षात्कार के रूपों का वर्णन किया गया है:
1. संरचित साक्षात्कार (Structured Interview)
इस प्रकार के साक्षात्कार में पूर्व निर्धारित प्रश्नों का एक निश्चित क्रम होता है। सभी अभ्यर्थियों से एक ही प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं जिससे तुलनात्मक मूल्यांकन करना आसान होता है। उदाहरण के लिए, सरकारी नौकरी की चयन प्रक्रिया में प्रायः संरचित साक्षात्कार का प्रयोग किया जाता है।
2. असंरचित साक्षात्कार (Unstructured Interview)
इसमें प्रश्नों की कोई निश्चित सूची नहीं होती। साक्षात्कारकर्ता परिस्थिति के अनुसार प्रश्न पूछता है और अभ्यर्थी के उत्तरों के आधार पर आगे संवाद बढ़ाता है। यह शोध कार्यों या पत्रकारिता में उपयोगी होता है क्योंकि इसमें स्वतंत्रता अधिक होती है।
3. पैनल साक्षात्कार (Panel Interview)
इस प्रकार के साक्षात्कार में कई विशेषज्ञ या अधिकारी एक साथ अभ्यर्थी का मूल्यांकन करते हैं। सभी पैनल सदस्य अपने-अपने प्रश्न पूछते हैं और सामूहिक रूप से निर्णय लेते हैं। उच्च पदों की भर्ती या शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश प्रक्रिया में इसका प्रयोग सामान्य है।
4. समूह साक्षात्कार (Group Interview)
समूह साक्षात्कार में कई अभ्यर्थियों को एक साथ आमंत्रित किया जाता है और किसी समस्या पर चर्चा करने को कहा जाता है। इसका उद्देश्य उनकी नेतृत्व क्षमता, संवाद कौशल और टीम वर्क को परखना होता है। कॉर्पोरेट क्षेत्र में प्रबंधकीय पदों के चयन हेतु यह विधि लोकप्रिय है।
5. दूरभाष या ऑनलाइन साक्षात्कार (Telephonic/Online Interview)
प्रौद्योगिकी के विकास के साथ, दूरस्थ साक्षात्कार का चलन बढ़ा है। इसमें फोन, वीडियो कॉल या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करके अभ्यर्थियों का मूल्यांकन किया जाता है। यह समय और संसाधनों की बचत करता है तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिभा चयन को आसान बनाता है।
6. तनाव साक्षात्कार (Stress Interview)
इस प्रकार के साक्षात्कार में अभ्यर्थी को जानबूझकर चुनौतीपूर्ण या दबावपूर्ण परिस्थितियों में रखा जाता है ताकि उसकी मानसिक दृढ़ता और समस्या-समाधान क्षमता का परीक्षण किया जा सके। इसका उपयोग विशेष रूप से उन पदों के लिए किया जाता है जहाँ दबाव में कार्य करना आवश्यक होता है।
निष्कर्ष
साक्षात्कार के विभिन्न रूप उनकी उपयोगिता और उद्देश्यों के अनुसार भिन्न होते हैं। किसी संगठन या संस्था को अपनी आवश्यकताओं के आधार पर उचित साक्षात्कार विधि का चयन करना चाहिए। संरचित रूप अधिक वस्तुनिष्ठ होता है, जबकि असंरचित और समूह साक्षात्कार प्रतिभा और व्यक्तित्व के विविध पहलुओं को उजागर करते हैं। आधुनिक समय में ऑनलाइन साक्षात्कार इसकी दक्षता और व्यापकता को और बढ़ा रहे हैं।
Question:-05
औपचारिक पत्र को परिभाषित करते हुए, औपचारिक पत्र का एक नमूना प्रस्तुत कीजिए।
Answer:
औपचारिक पत्र की परिभाषा एवं नमूना
औपचारिक पत्र की परिभाषा
औपचारिक पत्र (Formal Letter) वह पत्र होता है जिसे किसी आधिकारिक, व्यावसायिक या औपचारिक उद्देश्य से लिखा जाता है। इसका प्रयोग सरकारी कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों, व्यावसायिक संस्थाओं या उच्च अधिकारियों के साथ संचार स्थापित करने के लिए किया जाता है। इस प्रकार के पत्र में भाषा शिष्ट, स्पष्ट और संक्षिप्त होती है तथा अनावश्यक भावनात्मक अभिव्यक्तियों से बचा जाता है। इसमें प्रेषक और प्राप्तकर्ता के बीच औपचारिकता का निर्वाह अनिवार्य होता है।
औपचारिक पत्र के मुख्य तत्व
- प्रेषक का पता
- तारीख
- प्राप्तकर्ता का नाम एवं पता
- विषय (Subject)
- सम्मान सूचक संबोधन (Salutation)
- मुख्य पत्र-विषय (Body)
- समापन (Closing)
- प्रेषक का नाम एवं हस्ताक्षर
औपचारिक पत्र का नमूना
प्रेषक का पता: 123, नेहरू नगर, नई दिल्ली – 110001
दिनांक: 29 अगस्त 2025
प्राप्तकर्ता का पता: प्रधानाचार्य, केन्द्रीय विद्यालय, नई दिल्ली – 110002
विषय: अवकाश हेतु आवेदन
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं कक्षा 10वीं का छात्र हूँ। मुझे पारिवारिक कारणवश 2 सितंबर 2025 से 4 सितंबर 2025 तक विद्यालय से अनुपस्थित रहना पड़ेगा। अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि मुझे उपर्युक्त अवधि हेतु अवकाश प्रदान करने की कृपा करें।
आपकी कृपा के लिए सदैव आभारी रहूँगा।
भवदीय, राहुल शर्मा कक्षा 10वीं
निष्कर्ष
औपचारिक पत्र एक व्यवस्थित और शिष्ट माध्यम है जिससे व्यक्ति अपनी आवश्यकताएँ, निवेदन या सूचना किसी संस्था अथवा अधिकारी तक पहुँचाता है। इसके निश्चित प्रारूप एवं विनम्र भाषा के कारण यह संचार का सबसे प्रभावी औपचारिक साधन माना जाता है।
Question:-06
वैयक्तिक लेखन की भाषा को उदाहरण सहित लिखिए।
Answer:
वैयक्तिक लेखन की भाषा
वैयक्तिक लेखन की परिभाषा
वैयक्तिक लेखन (Personal Writing) वह लेखन शैली है जिसका प्रयोग निजी या व्यक्तिगत विचारों, अनुभवों, भावनाओं और परिस्थितियों को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। इसमें लेखक अपने मनोभावों को सरल, सहज और स्वाभाविक भाषा में प्रकट करता है। यह औपचारिक लेखन से भिन्न होता है क्योंकि इसमें औपचारिकता की अपेक्षा आत्मीयता और भावनात्मकता का अधिक महत्व होता है।
वैयक्तिक लेखन की भाषा की विशेषताएँ
- सरल और स्पष्ट भाषा – इसमें कठिन शब्दों या जटिल वाक्यों का प्रयोग नहीं किया जाता।
- भावनात्मक अभिव्यक्ति – लेखक अपने मन की भावनाओं को सीधे प्रकट करता है।
- स्वाभाविक प्रवाह – भाषा में कृत्रिमता नहीं होती, बल्कि यह सहज एवं प्रवाहपूर्ण होती है।
- प्रथम पुरुष का प्रयोग – “मैं”, “मुझे”, “हम” आदि शब्दों का प्रयोग प्रायः अधिक होता है।
- व्यक्तिगत अनुभवों का उल्लेख – इसमें व्यक्तिगत घटनाओं या यादों को स्थान दिया जाता है।
उदाहरण
डायरी लेखन: 12 जनवरी 2025 आज का दिन बहुत विशेष रहा। सुबह विद्यालय में गणतंत्र दिवस की तैयारी के लिए रिहर्सल हुआ। मुझे मुख्य अतिथि के स्वागत हेतु भाषण तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई। प्रारंभ में थोड़ी घबराहट हुई, परंतु शिक्षिका के प्रोत्साहन से आत्मविश्वास बढ़ा। शाम को घर लौटकर भाषण लिखना शुरू किया और परिवार से भी सुझाव लिए। आशा है कि मैं इसे अच्छे से प्रस्तुत कर पाऊँगा।
निष्कर्ष
वैयक्तिक लेखन की भाषा सहज, आत्मीय और स्पष्ट होती है, जिसमें लेखक बिना किसी औपचारिक बंधन के अपने विचारों और भावनाओं को प्रकट करता है। यह लेखन शैली डायरी, व्यक्तिगत पत्र, आत्मकथा, संस्मरण या यात्रा-वृत्तांत में विशेष रूप से देखने को मिलती है।
Question:-07
भाषण की भाषा
साहित्यिक भाषा
संवाद की संरचना
भाषा के उपयोग
Answer:
भाषण की भाषा
भाषण की भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा वक्ता श्रोताओं के समक्ष अपने विचार स्पष्ट और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। इसका उद्देश्य केवल जानकारी देना ही नहीं, बल्कि श्रोताओं को प्रभावित करना और उनके मन में अपेक्षित प्रतिक्रिया उत्पन्न करना भी होता है। भाषण की भाषा प्रायः सरल, स्पष्ट और प्रभावपूर्ण होती है। इसमें ऐसे शब्दों का चयन किया जाता है जो सीधे श्रोता के मन तक पहुँचें। कठिन शब्दों या जटिल वाक्यों का प्रयोग भाषण की प्रभावशीलता को कम कर सकता है।
भाषण में रोचकता बनाए रखने के लिए अलंकारिक शैली, प्रश्नोत्तर शैली तथा भावनात्मक शब्दावली का प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त, तर्कसंगतता और उदाहरणों का समावेश श्रोताओं को विश्वास दिलाने में सहायक होता है। औपचारिक भाषणों में शिष्टता और मर्यादा का विशेष ध्यान रखा जाता है, वहीं अनौपचारिक भाषणों में आत्मीयता और सहजता प्रमुख रहती है।
उदाहरण के लिए, स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिया गया भाषण प्रेरक, देशभक्ति से परिपूर्ण और उत्साहवर्धक होता है। इसमें देश के प्रति कर्तव्य, बलिदानों का उल्लेख और भविष्य के संकल्प स्पष्ट रूप से व्यक्त किए जाते हैं।
साहित्यिक भाषा
साहित्यिक भाषा वह भाषा है जिसका प्रयोग साहित्य रचनाओं जैसे कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि में किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य सौंदर्यबोध उत्पन्न करना और पाठकों को भावनात्मक तथा बौद्धिक स्तर पर प्रभावित करना है। साहित्यिक भाषा सामान्य भाषा से भिन्न होती है क्योंकि इसमें अलंकार, अनुप्रास, रूपक, उपमा तथा भावपूर्ण शब्दावली का अधिक प्रयोग होता है।
यह भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि सृजनात्मकता का प्रतीक भी है। लेखक या कवि अपने विचारों और भावनाओं को सौंदर्यपूर्ण एवं कलात्मक शैली में प्रस्तुत करता है। उदाहरण के लिए, कवि जब “चाँदनी रात” का वर्णन करता है तो केवल एक दृश्य प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उसमें सौंदर्य, शांति और भावनात्मकता भी भर देता है।
साहित्यिक भाषा का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि यह सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक भावनाओं को अभिव्यक्त करती है। तुलसीदास, प्रेमचंद और निराला जैसे रचनाकारों की भाषा ने समाज में चेतना जागृत की और साहित्य को जीवंत बनाया।
संवाद की संरचना
संवाद की संरचना (Structure of Dialogue) का अर्थ है दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच विचारों के आदान-प्रदान को सुसंगत और अर्थपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करना। संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि इसमें भाव, लहजा और परिस्थितियों का भी समावेश होता है। एक अच्छे संवाद की संरचना में स्पष्टता, प्रासंगिकता और स्वाभाविकता आवश्यक है।
संवाद के मुख्य अंग हैं – संबोधन, प्रश्नोत्तर, प्रतिक्रिया और निष्कर्ष। संवाद में प्रत्येक पात्र के विचारों और भावनाओं को उनके व्यक्तित्व के अनुरूप अभिव्यक्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, नाटक या कहानी में संवाद पात्रों के चरित्र को उभारने, कथा को आगे बढ़ाने और पाठकों या दर्शकों को परिस्थितियों से जोड़ने का कार्य करता है।
संवाद लिखते समय भाषा का चयन भी परिस्थिति और पात्रों के स्तर के अनुसार किया जाता है। औपचारिक संवादों में शिष्टता और मर्यादा रहती है, जबकि अनौपचारिक संवादों में सहजता और आत्मीयता अधिक होती है।
भाषा के उपयोग
भाषा का उपयोग मानव जीवन के सभी क्षेत्रों में होता है। यह केवल संचार का साधन नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम भी है। भाषा का प्रयोग सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और तकनीकी सभी क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में देखा जाता है।
शैक्षणिक क्षेत्र में भाषा का प्रयोग ज्ञानार्जन और शिक्षण के लिए किया जाता है। साहित्यिक क्षेत्र में यह कल्पनाशक्ति और सौंदर्यबोध व्यक्त करने का माध्यम है। सामाजिक जीवन में भाषा का उपयोग संबंधों को सुदृढ़ करने और परंपराओं को आगे बढ़ाने में सहायक होता है।
तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में भाषा संक्षिप्त, सटीक और स्पष्ट होती है, जबकि कला और साहित्य में यह भावनात्मक और सौंदर्यपूर्ण होती है। उदाहरण के लिए, एक वैज्ञानिक रिपोर्ट की भाषा सरल और तथ्यात्मक होती है, वहीं एक कविता की भाषा अलंकारिक और भावपूर्ण होती है।
भाषा के उचित उपयोग से व्यक्ति की अभिव्यक्ति क्षमता बढ़ती है और वह समाज में प्रभावी भूमिका निभा सकता है।